RSS

Category Archives: Faith & Devotion

श्राद्ध महिमा

SHRADHDH

भारतीय संस्कृति की एक बड़ी विशेषता है कि जीते-जी तो विभिन्न संस्कारों के द्वारा, धर्मपालन के द्वारा मानव को समुन्नत करने के उपाय बताती ही है लेकिन मरने के बाद भी, अत्येष्टि संस्कार के बाद भी जीव की सदगति के लिए किये जाने योग्य संस्कारों का वर्णन करती है।

मरणोत्तर क्रियाओं-संस्कारों का वर्णन हमारे शास्त्र-पुराणों में आता है। आश्विन(गुजरात-महाराष्ट्र के मुताबिक भाद्रपद) के कृष्ण पक्ष को हमारे हिन्दू धर्म में श्राद्ध पक्ष के रूप में मनाया जाता है। श्राद्ध की महिमा एवं विधि का वर्णन विष्णु, वायु, वराह, मत्स्य आदि पुराणों एवं महाभारत, मनुस्मृति आदि शास्त्रों में यथास्थान किया गया है। उन्हीं पर आधारित पूज्यश्री के प्रवचनों को प्रस्तुत पुस्तक में संकलित किया गया है ताकि जनसाधारण ‘श्राद्ध महिमा’ से परिचित होकर पितरों के प्रति अपना कर्त्तव्य-पालन कर सके।

दिव्य लोकवासी पितरों के पुनीत आशीर्वाद से आपके कुल में दिव्य आत्माएँ अवतरित हो सकती हैं। जिन्होंने जीवन भर खून-पसीना एक करके इतनी साधन-सामग्री व संस्कार देकर आपको सुयोग्य बनाया उनके प्रति सामाजिक कर्त्तव्य-पालन अथवा उन पूर्वजों की प्रसन्नता, ईश्वर की प्रसन्नता अथवा अपने हृदय की शुद्धि के लिए सकाम व निष्काम भाव से यह श्राद्धकर्म करना चाहिए।

श्राद्ध महिमा

हिन्दू धर्म में एक अत्यंत सुरभित पुष्प है कृतज्ञता की भावना, जो कि बालक में अपने माता-पिता के प्रति स्पष्ट परिलक्षित होती है। हिन्दू धर्म का व्यक्ति अपने जीवित माता-पिता की सेवा तो करता ही है, उनके देहावसान के बाद भी उनके कल्याण की भावना करता है एवं उनके अधूरे शुभ कार्यों को पूर्ण करने का प्रयत्न करता है। ‘श्राद्ध-विधि’ इसी भावना पर आधारित है।

मृत्यु के बाद जीवात्मा को उत्तम, मध्यम एवं कनिष्ठ कर्मानुसार स्वर्ग नरक में स्थान मिलता है। पाप-पुण्य क्षीण होने पर वह पुनः मृत्युलोक (पृथ्वी) में आता है। स्वर्ग में जाना यह पितृयान मार्ग है एवं जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त होना यह देवयान मार्ग है।

पितृयान मार्ग से जाने वाले जीव पितृलोक से होकर चन्द्रलोक में जाते हैं। चंद्रलोक में अमृतान्न का सेवन करके निर्वाह करते हैं। यह अमृतान्न कृष्ण पक्ष में चंद्र की कलाओं के साथ क्षीण होता रहता है। अतः कृष्ण पक्ष में वंशजों को उनके लिए आहार पहुँचाना चाहिए, इसीलिए श्राद्ध एवं पिण्डदान की व्यवस्था की गयी है। शास्त्रों में आता है कि अमावस के दिन तो पितृतर्पण अवश्य करना चाहिए।

आधुनिक विचारधारा एवं नास्तिकता के समर्थक शंका कर सकते हैं किः “यहाँ दान किया गया अन्न पितरों तक कैसे पहुँच सकता है?”

भारत की मुद्रा ‘रुपया’ अमेरिका में ‘डॉलर’ एवं लंदन में ‘पाउण्ड’ होकर मिल सकती है एवं अमेरिका के डॉलर जापान में येन एवं दुबई में दीनार होकर मिल सकते हैं। यदि इस विश्व की नन्हीं सी मानव रचित सरकारें इस प्रकार मुद्राओं का रुपान्तरण कर सकती हैं तो ईश्वर की सर्वसमर्थ सरकार आपके द्वारा श्राद्ध में अर्पित वस्तुओं को पितरों के योग्य करके उन तक पहुँचा दे, इसमें क्या आश्चर्य है?

मान लो, आपके पूर्वज अभी पितृलोक में नहीं, अपित मनुष्य रूप में हैं। आप उनके लिए श्राद्ध करते हो तो श्राद्ध के बल पर उस दिन वे जहाँ होंगे वहाँ उन्हें कुछ न कुछ लाभ होगा। मैंने इस बात का अनुभव करके देखा है। मेरे पिता अभी मनुष्य योनि में हैं। यहाँ मैं उनका श्राद्ध करता हूँ उस दिन उन्हें कुछ न कुछ विशेष लाभ अवश्य हो जाता है।

मान लो, आपके पिता की मुक्ति हो गयी हो तो उनके लिए किया गया श्राद्ध कहाँ जाएगा? जैसे, आप किसी को मनीआर्डर भेजते हो, वह व्यक्ति मकान या आफिस खाली करके चला गया हो तो वह मनीआर्डर आप ही को वापस मिलता है, वैसे ही श्राद्ध के निमित्त से किया गया दान आप ही को विशेष लाभ देगा।

दूरभाष और दूरदर्शन आदि यंत्र हजारों किलोमीटर का अंतराल दूर करते हैं, यह प्रत्यक्ष है। इन यंत्रों से भी मंत्रों का प्रभाव बहुत ज्यादा होता है।

देवलोक एवं पितृलोक के वासियों का आयुष्य मानवीय आयुष्य से हजारों वर्ष ज्यादा होता है। इससे पितर एवं पितृलोक को मानकर उनका लाभ उठाना चाहिए तथा श्राद्ध करना चाहिए।

भगवान श्रीरामचन्द्रजी भी श्राद्ध करते थे। पैठण के महान आत्मज्ञानी संत हो गये श्री एकनाथ जी महाराज। पैठण के निंदक ब्राह्मणों ने एकनाथ जी को जाति से बाहर कर दिया था एवं उनके श्राद्ध-भोज का बहिष्कार किया था। उन योगसंपन्न एकनाथ जी ने ब्राह्मणों के एवं अपने पितृलोक वासी पितरों को बुलाकर भोजन कराया। यह देखकर पैठण के ब्राह्मण चकित रह गये एवं उनसे अपने अपराधों के लिए क्षमायाचना की।

जिन्होंने हमें पाला-पोसा, बड़ा किया, पढ़ाया-लिखाया, हममें भक्ति, ज्ञान एवं धर्म के संस्कारों का सिंचन किया उनका श्रद्धापूर्वक स्मरण करके उन्हें तर्पण-श्राद्ध से प्रसन्न करने के दिन ही हैं श्राद्धपक्ष। श्राद्धपक्ष आश्विन के (गुजरात-महाराष्ट्र में भाद्रपद के) कृष्ण पक्ष में की गयी श्राद्ध-विधि गया क्षेत्र में की गयी श्राद्ध-विधी के बराबर मानी जाती है। इस विधि में मृतात्मा की पूजा एवं उनकी इच्छा-तृप्ति का सिद्धान्त समाहित होता है।

प्रत्येक व्यक्ति के सिर पर देवऋण, पितृऋण एवं ऋषिऋण रहता है। श्राद्धक्रिया द्वारा पितृऋण से मुक्त हुआ जाता है। देवताओं को यज्ञ-भाग देने पर देवऋण से मुक्त हुआ जाता है। ऋषि-मुनि-संतों के विचारों को आदर्शों को अपने जीवन में उतारने से, उनका प्रचार-प्रसार करने से एवं उन्हे लक्ष्य मानकर आदरसहित आचरण करने से ऋषिऋण से मुक्त हुआ जाता है।

पुराणों में आता है कि आश्विन(गुजरात-महाराष्ट्र के मुताबिक भाद्रपद) कृष्ण पक्ष की अमावस (पितृमोक्ष अमावस) के दिन सूर्य एवं चन्द्र की युति होती है। सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करता है। इस दिन हमारे पितर यमलोक से अपना निवास छोड़कर सूक्ष्म रूप से मृत्युलोक में अपने वंशजों के निवास स्थान में रहते हैं। अतः उस दिन उनके लिए विभिन्न श्राद्ध करने से वे तृप्त होते हैं।

सुनी है एक कथाः महाभारत के युद्ध में दुर्योधन का विश्वासपात्र मित्र कर्ण देह छोड़कर ऊर्ध्वलोक में गया एवं वीरोचित गति को प्राप्त हुआ। मृत्युलोक में वह दान करने के लिए प्रसिद्ध था। उसका पुण्य कई गुना बढ़ चुका था एवं दान स्वर्ण-रजत के ढेर के रूप में उसके सामने आया।

कर्ण ने धन का दान तो किया था किन्तु अन्नदान की उपेक्षा की थी अतः उसे धन तो बहुत मिला किन्तु क्षुधातृप्ति की कोई सामग्री उसे न दी गयी। कर्ण ने यमराज से प्रार्थना की तो यमराज ने उसे 15 दिन के लिए पृथ्वी पर जाने की सहमति दे दी। पृथ्वी पर आकर पहले उसने अन्नदान किया। अन्नदान की जो उपेक्षा की थी उसका बदला चुकाने के लिए 15 दिन तक साधु-संतों, गरीबों-ब्राह्मणों को अन्न-जल से तृप्त किया एवं श्राद्धविधि भी की। यह आश्विन (गुजरात महाराष्ट्र के मुताबिक भाद्रपद) मास का कृष्णपक्ष ही था। जब वह ऊर्ध्वलोक में लौटा तब उसे सभी प्रकार की खाद्य सामग्रियाँ ससम्मान दी गयीं।

धर्मराज यम ने वरदान दिया किः “इस समय जो मृतात्माओं के निमित्त अन्न जल आदि अर्पित करेगा, उसकी अंजलि मृतात्मा जहाँ भी होगी वहाँ तक अवश्य पहुँचेगी।”

जो निःसंतान ही चल बसें हों उन मृतात्माओं के लिए भी यदि कोई व्यक्ति इन दिनों में श्राद्ध-तर्पण करेगा अथवा जलांजलि देगा तो वह भी उन तक पहुँचेगी। जिनकी मरण तिथि ज्ञात न हो उनके लिए भी इस अवधि के दौरान दी गयी अंजलि पहुँचती है।

वैशाख शुक्ल 3, कार्तिक शुक्ल 9, आश्विन (गुजरात-महाराष्ट्र के मुताबिक भाद्रपद) कृष्ण 12 एवं पौष (गुजरात-महाराष्ट्र के मुताबिक मार्गशीर्ष) की अमावस ये चार तिथियाँ युगों की आदि तिथियाँ हैं। इन दिनों में श्राद्ध करना अत्यंत श्रेयस्कर है।

श्राद्धपक्ष के दौरान दिन में तीन बार स्नान एवं एक बार भोजन का नियम पालते हुए श्राद्ध विधि करनी चाहिए।

जिस दिन श्राद्ध करना हो उस दिन किसी विशिष्ट व्यक्ति को आमंत्रण न दें, नहीं तो उसी की आवभगत में ध्यान लगा रहेगा एवं पितरों का अनादर हो जाएगा। इससे पितर अतृप्त होकर नाराज भी हो सकते हैं। जिस दिन श्राद्ध करना हो उस दिन विशेष उत्साहपूर्वक सत्संग, कीर्तन, जप, ध्यान आदि करके अंतःकरण पवित्र रखना चाहिए।

जिनका श्राद्ध किया जाये उन माता, पिता, पति, पत्नी, संबंधी आदि का स्मरण करके उन्हें याद दिलायें किः “आप देह नहीं हो। आपकी देह तो समाप्त हो चुकी है, किंतु आप विद्यमान हो। आप अगर आत्मा हो.. शाश्वत हो… चैतन्य हो। अपने शाश्वत स्वरूप को निहार कर हे पितृ आत्माओं ! आप भी परमात्ममय हो जाओ। हे पितरात्माओं ! हे पुण्यात्माओं ! अपने परमात्म-स्वभाव का स्मऱण करके जन्म मृत्यु के चक्र से सदा-सदा के लिए मुक्त हो जाओ। हे पितृ आत्माओँ ! आपको हमारे प्रणाम हैं। हम भी नश्वर देह के मोह से सावधान होकर अपने शाश्वत् परमात्म-स्वभाव में जल्दी जागें…. परमात्मा एवं परमात्म-प्राप्त महापुरुषों के आशीर्वाद आप पर हम पर बरसते रहें…. ॐ….ॐ…..ॐ….”

सूक्ष्म जगत के लोगों को हमारी श्रद्धा और श्रद्धा से दी गयी वस्तु से तृप्ति का एहसास होता है। बदले में वे भी हमें मदद करते हैं, प्रेरणा देते हैं, प्रकाश देते हैं, आनंद और शाँति देते

हैं। हमारे घर में किसी संतान का जन्म होने वाला हो तो वे अच्छी आत्माओं को भेजने में सहयोग करते हैं। श्राद्ध की बड़ी महिमा है। पूर्वजों से उऋण होने के लिए, उनके शुभ आशीर्वाद से उत्तम संतान की प्राप्ति के लिए श्राद्ध किया जाता है।

आजादी से पूर्व काँग्रेस बुरी तरह से तीन-चार टुकड़ों में बँट चुकी थी। अँग्रेजों का षडयंत्र सफल हो रहा था। काँग्रेस अधिवेशन में कोई आशा नहीं रह गयी थी कि बिखरे हुए नेतागण कुछ कर सकेंगे। महामना मदनमोहन मालवीय, भारत की आजादी में जिनका योगदान सराहनीय रहा है, यह बात ताड़ गये कि सबके रवैये बदल चुके हैं और अँग्रेजों का षडयंत्र सफल हो रहा है। अतः अधिवेशन के बीच में ही चुपके से खिसक गये एक कमरे में। तीन आचमन लेकर, शांत होकर बैठ गये। उन्हें अंतः प्रेरणा हुई और उन्होंने श्रीमदभागवदगीता के गजेन्द्रमोक्ष’ का पाठ किया।

बाद में थोड़ा सा सत्संग प्रवचन दिया तो काँग्रेस के सारे खिंचाव-तनाव समाप्त हो गये एवं सब बिखरे हुए काँग्रेसी एक जुट होकर चल पड़े। आखिर अंग्रेजों को भारत छोड़ना ही पड़ा।

काँग्रेस के बिखराव को समाप्त करके, काँग्रसियों को एकजुट कर कार्य करवानेवाले मालवीयजी का जन्म कैसे हुआ था?

मालवीयजी के जन्म से पूर्व हिन्दुओं ने अंग्रेजों के विरुद्ध जब आंदोलन की शुरुआत की थी तब अंग्रेजों ने सख्त ‘कर्फ्यू’ जारी कर दिया था। ऐसे दौर में एक बार मालवीयजी के पिता जी कहीं से कथा करके पैदल ही घर आ रहे थे।

उन्हें मार्ग में जाते देखकर अंग्रेज सैनिकों ने रोका-टोका एवं सताना शुरु किया। वे उनकी भाषा नहीं जानते थे और अंग्रेज सैनिक उनकी भाषा नहीं जानते थे। मालवीय जी के पिता ने अपना साज निकाला और कीर्तन करने लगे। कीर्तन से अंग्रेज सैनिकों को कुछ आनंद आया और इशारों से धन्यवाद देते  हुए उन्होंने कहा किः “चलो, हम आपको पहुँचा देते हैं।” यह देखकर मालवीयजी के पिता को हुआ किः “मेरे कीर्तन से प्रभावित होकर इन्होंने मुझे तो हैरान करना बन्द कर दिया किन्तु मेरे भारत देश के लाखों-करोड़ों भाईयों का शोषण हो रहा है, इसके लिए मुझे कुछ करना चाहिए।”

बाद में वे गया जी गये और प्रेमपूर्वक श्राद्ध किया। श्राद्ध के अंत में अपने दोनों हाथ उठाकर पितरों से प्रार्थना करते हुए उन्होंने कहाः ‘हे पितरो ! मेरे पिण्डदान से अगर आप तृप्त हुए हों, मेरा किया हुआ श्राद्ध अगर आप तक पहुँचा हो तो आप कृपा करके मेरे घर में ऐसी ही संतान दीजिए जो अंग्रेजों को भगाने का काम करे और मेरा भारत आजाद हो जाये…..।’

पिता की अंतिम प्रार्थना फली। समय पाकर उन्हीं के घर मदनमोहन मालवीय जी का जन्म हुआ।

Advertisements
 
 

Faith in God

Image

In a town in West Bengal (a state in India) there lived two brothers, Ananta and Mukunda. Mukunda, who later became the great Saint Paramhansa Yogananda, was the younger brother of Ananta. Ananta, a man of the world, did not approve of Mukunda’s spiritual occupations, since he worried for his brother’s well being in the absence of worldly ambitions.

One day, their differences came to the fore. Mukunda said, “You well know Ananta, I seek my inheritance from God, our Heavenly Father.” Ananta, an accountant by profession, quickly retorted, “Money first; God can come later! Who knows? Life may be too long.” Mukunda would not give in, “God first, money can come later! Who can tell? Life may be too short.”          The heated argument between the brothers ended with the elder brother throwing a challenge. He proposed to send Mukunda accompanied by his friend, Narendra, to the nearby city of Mathura by train, without any money or other provisions on them. As per the conditions of the challenge, Mukunda and Narendra were not to take money from anyone or reveal their identity or bet to anyone. Despite all this, they were to return home before midnight. Narendra would act as witness to make sure that Mukunda abided by the conditions of the bet. Ananta was trying to test whether God would meet Mukunda’s need for food and return fare. Mukunda welcomed the challenge. He had complete faith in God that He will take care of him during this unusual challenge and boarded the train to Mathura with the witness, Narendra.

It so happened that two strangers, who boarded their train, without a word from Mukunda or Narendra, led them to an ashram (hermitage). There they were offered a sumptuous feast, originally meant for some royal visitors, who had canceled their visit at the last moment. While resting after the meal, a cheerful young man approached them and offered to be their host for no apparent reason. Without Mukunda or Narendra revealing their identity or the challenge, the young man took them sightseeing around Mathura, mentioning how much of an honor it was to serve devotees of God in such a manner! At the end of the day, when parting from them, the young man presented them with two train tickets to return to their town and some money, urging them not to refuse his offering. And so ended the test, where Mukunda and Narendra were well-provided for, despite not asking anyone for money, food or return tickets and not carrying any money with them.

The two reached home safely. Ananta was astonished. “I understand for the first time your lack of worldly ambitions!” he told the future Paramhansa. There and then itself, he asked Mukunda to initiate him into spiritual practice.

Moral: Complete faith in God is the only currency one needs to make spiritual progress. However, in order to develop the kind of faith young Mukunda (Paramhansa Yogananda) had, one has to do regular spiritual practice.

 
Leave a comment

Posted by on September 27, 2013 in Faith & Devotion

 

Tags: , , , , , , , , , , , ,

Saint Sakhu

Image

Many years ago, in a village in Maharashtra (a state in India) there lived a woman called Sakhu. Sakhu was an ardent devotee of Lord Vitthal. She led a hard life. She was ill-treated by her in-laws and her husband. She had to do all the household tasks and would hardly get two square meals a day. She toiled from daybreak till late at night. Sakhu spent her days without any affection or love, either from her husband or from his parents. However, Sakhu sincerely believed what her father had told her years ago, “Lord Vitthal will never let you down.” So she bore all the sufferings silently. Her devotion to God continued to grow stronger and she constantly remembered The Lord by chanting (repeating) His Name continuously during all her activities. She fulfilled all her duties at home perfectly and without any complaint.

One day, she heard that many devotees from her village were going on a pilgrimage to Pandharpur. She too, wished to go, but was forbidden by her in-laws. Instead, they tied her to a pole, so that she would not be able to go on the pilgrimage. She cried out in desperation, “Vitthal! Vitthal! Please fulfill my desire to see You.” The Lord heard His devotee’s cry for help. Around midnight, he took the form of a woman and went to Sakhu, and untied her. He said to her, “You are keen on seeing Lord Vitthal, so go ahead and join the others. I will perform all your household duties till you come back.”

Sakhu was overjoyed and joined the other villagers on the pilgrimage. Meanwhile, Lord Vitthal took on Sakhu’s form and remained in her place. Later the in-laws untied Sakhu. God, in Sakhu’s guise, did not utter a word in reply and continued to chant Vitthal’s name. He attended to all of Sakhu’s household duties. As the days passed, the members of the household automatically began to look upon this ‘Sakhu’ with respect. The mother-in-law could no longer admonish ‘Sakhu’ as before. Nor could the husband raise his hand to beat Her. Due to the divine presence, the whole atmosphere in the house was transformed. When the real Sakhu came back from the pilgrimage, she found a new life awaiting her.

Moral: Total faith and true devotion like that of Sakhu, won her The Lord.

 
Leave a comment

Posted by on September 25, 2013 in Faith & Devotion

 

Tags: , , , , , , , , ,

Will the media accusing H.H. Asaram Bapu of rape answer following questions ?

 

For the last 10 days, media has been publishing news against H.H. Asaram Bapu. While publishing one-sided news, media fail to follow even simple rules of journalism. While organising deliberations on this topic, Spokesperson of Sanatan Sanstha Shri. Abhay Vartak, who attends as the representative of H.H. Asaram Bapu is not allowed speak. Media is disseminating news in the fashion ‘call the dog mad and shoot it’. Will these media answer the questions given ahead ?

1. More than 150 people’s representatives in the parliament are facing criminal cases such as, murders, rapes, extortion, molestation, corruption etc. What efforts have been made by the media for the action to be taken against them ?

2. In the case of fake stamp paper scam, Abdul Karim Telgi named Sharad Pawar and Chhagan Bhujbal during narco-analysis test. What efforts have been made by media for the action to be taken against both of them ?

3. Robert Vadhera was accused with proofs of indulging in land scam. However, he was not arrested by Congress rulers. Why the media maintained silence on this issue ?

4. On 11th August 2012, Muslim rioters burnt OB vans of media at Azad Maidan in Mumbai. Media representatives faced near-fatal assaults. What action has been taken by the media for the arrest of the culprits ?

5. Not a single leader or office bearer of Raza Academy, mastermind of the above riot was arrested. Does the media agree with it ?

6. A news item that Rajiv Gandhi maintains an account in Swiss bank was published. Why did the media not run a parallel judicial system in that case ?

7. In the year 2001, Shahi Imam of Jama Masjid had incited local Muslims by opposing the officers of Municipal Corporation, who were deputed to take action against the encroachment by Muslims in Lodhi Complex at Dehali. Even after the lapse of 12 years of the registration of an offence against him, he has not been arrested. Why the media are maintaining silence over this issue ?

8. Thefts have taken place in more than 250 temples, in Goa during past few years, and 35 temples have been badly ransacked. Why no publicity has been given to these incidents by the media ?

9. Muslims are attacking Hindus everyday in the States of Bengal, Assam, Tamil Nadu, Kerala, and Uttar Pradesh. Hindu women are being raped by fanatic jihadis. Why no publicity has been given to these incidents by the media ?

10. More than a Lakh of Hindu young women have been made victims by Jihadi fanatics through the medium of ‘Love Jihad’. Why no publicity has been given to these incidents by the media ?

11. Relatives of the Jihadi terrorists Mohammad Afzal, Isharat jahan, Yasin Bhatkal, and Jihadi terrorists in Batla House judge them as innocent. Why the media are maintaining silence over this issue ? How can these relatives support the Jihadis ? Does not this question arise in the mind of the media ?

 
1 Comment

Posted by on September 23, 2013 in Faith & Devotion, Vedant

 

Tags: , , , , ,

Prayer : An easy way to please God !

         Surrending to the God and pleading with Him for what you want is called prayer. God’s blessings and Divine energy (Chaitanya shakti) are attained by praying. Also worries reduce and faith in the God increases, and the mind gains concentration by prayer. We also remain protected against negative energies by prayer.

Some prayers to be done daily

Prayer before a bath :  “O God / O Jaladevata (Deity of water) just as my body is getting cleansed with this pure water, let my mind also get purified and let me be able to absorb your Divine energy.”

Prayer before starting studies : “O God / O Sri Ganesh ! Please remove the obstacles in my studies. Please give me wisdom and strength to do better in my studies.”

Prayer before meals :  “O God / Annapurna Devi ( Deity of food) ! I am offering this food to you and having it as if it is your blessing. Bestow me with Divine energy with this blessing!”

 

 
Leave a comment

Posted by on September 23, 2013 in Faith & Devotion

 

Tags: , , , , , ,

Scams And Scandals Involving Spiritual People

Scams and Scandals Involving spiritual People

 

It is a million dollar question about, why do spiritual people get themselves entangled in these kinds of scandals? And if they do why do they get caught? Well finding themselves in these situations isn’t new for holy people – even Jesus Christ was defamed with regards to Mary Magdaline who was supposed to be a whore in His times.

Tantrik Chandraswami was accused once, and was later proven innocent. There were 1000s of cases against Satya Sai Baba for possible paedophilia – again all baseless. Then we had our Premananda, who was arrested for multiple rapes and imprisoned for a double lifetime – he eventually died of liver failure inside the jail. Swami Nithyananda’s sizzling videos come up when you search for porn on google. And Jayendra Saraswathi was arrested for his possible involvement in a murder and also improper behaviour with his female disciples!

There seems to be a strange commonality where in except Chandraswami, all the other saints in the list were booked for improper sexual conduct. Sri Sri Ravi Shankar has not made to the list yet – he surely will come with a bang – it is just a matter of time.

The hidden facts

I personally know a woman, a close aide of Jayendra Saraswathi, who was offered Rs 4 lakhs by the Tamil Nadu Police Department to fabricate a story of sexual molestation against the Guru. It wasn’t about the murder or about any sexual misconduct – the matter was about a dispute between the Guru and the then Chief Minister with regards to a real estate property. Sexual misbehaviour is the easiest way to defame any spiritual Guru anywhere in the world. It works perfectly.

Premananda was basically from Sri Lanka, and in a very short span of time had his own spatial ashram with people from all over the world flocking to his ashram – a real bad news for the Tamil Nadu government, which was then struggling with the Sri Lankan refugees.

Politicians have never liked anyone else having a crowd for themselves, because it becomes very hard to win elections if a particular Guru becomes an opinion leader later. Any Guru who is hand in glove with the government and their policies will always have an easier life in the spiritual world. If you rebel, you will be axed for sure. Premananda spent rest of his life inside Vellore jail. And what was he doing inside the jail? He was giving discourses to the inmates everyday.

Satya Sai Baba’s problems reduced to a very large extent once Presidents and Prime Ministers started visiting his ashrams regularly. And also Sai Baba escaped the axe very intelligently by providing water schemes for the state and also by donating enough funds to the neighbouring states. Who would want to kill or defame a golden egg laying duck?

The land value of Bidadi was almost nil when Nithyananda started working on his ashram. He started doing well, people started flocking, the real estate values increased multifold, and moreover he was a Tamil – a sect of people hated by most of the locals. Place a camera under the Guru’s ass, and you take home a point. From close associates of the Guru I know that Sri Sri Ravi Shankar is always good with the government. No wonder he had this red light flashing on top of his car, and also the government has agreed to have metro station till his ashram. As a native Indian we all know the truth that no Indian government body works in our favour or even works without money being thrown at them.

Today it is Asaram Bapu. A 16-year-old books him for sexual assault, and expected damage has been successfully done. The case will go on and the truth as always will prevail.

This phenomenon of mud sledging and defamation isn’t copyrighted to India hence we cannot take much pride in it. It happens all over the world, even in the United States of America. The moment any government feels that an individual can become a threat to the voting behaviour, they send sexual charges knocking at their doors – who can forget all the bullshit thrown at Michael Jackson.

 

 
1 Comment

Posted by on September 20, 2013 in Faith & Devotion

 

Tags: , , , ,

 
%d bloggers like this: